नरेगा से नाराजगी क्यों ?

उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार का केन्द्र से छत्तीस का आंकड़ा क्या हुआ, राज्य के विकास कार्यो पर भी उसका असर दिखने लगा। सूबे के लाखों लोगों को आंशिक रोजगार देने वाली नरेगा योजना के प्रति शासन कितना गंभीर है। इस बात की बानगी है कि महज ३० फीसद ही रकम वह खर्च कर पाई २३ अरब रूपए की मद्द से महरूम रह गए यहां के मजदूर। इस योजना को यहां के नौकरशाहों ने बकरी बन के चर डाला। कई जिलों में नरेगा घोटाले का पर्याय बन के रह गई।
सीतापुर, हरदोई, रायबरेली, उन्नाव व बाराबंकी ये पांचों जिलों की सरहदें सूबे की राजधानी से जुड़ी हुई है। यहां पर नरेगा योजना में करोड़ों का घोटाला होता रहा और मण्डलायुक्त, डीएम, सीडीओ स्तर के जिम्मेदार अफसर हाथ पर हाथ धरे रहे। राज्य में कमोबेष हर जिले में यही हालात है। पूर्वांचल हो या पष्चिमी अंचल के जिले, बुंदेलखंड हो या रूहेलखण्ड, राज्य सरकार की लापरवाही का शिकार हो गई केन्द्र की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा)। इसका मुख्य कारण रहा मायावती का केन्द्र सरकार से टकराव।
यूँ हजारों करोड़ की स्मारकों, प्रतिमाओं, उद्यानों एवं अन्य सुन्दरीकरण योजनाओं पर राज्य सरकार विकास में आए धन को पानी की तरह बहाती रही। हार कर हाई कोर्ट व मानसिकता के अधिकारियों को लताड़ सुनानी पड़ी। बजट का बड़ा हिस्सा बसपा के कथित आदर्श एवं मुख्यमंत्री की प्रतिमाओं, बसपा के चुनाव चिन्ह हाथियों के निर्माण, स्मारकों पर लखनऊ एवं नोएडा में खर्च करने की चिंता मुख्य सचिव अतुल गुप्ता, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव कुं. फतेह बहादुर सिंह, पंसदीदा अफसर शंषाक शेखर, विजय शंकर पाण्डेय, महेष गुप्ता, सहित पुलिस आला अधिकारियों को रही। वहीं आम ग्रामीण, गरीबों, दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों के घरो में चूल्हा जलवाने वाली नरेगा योजना के प्रति राज्य सरकार की संवेदना व सक्रियता क्यों मद्विम पड़ गई।
यही कारण है कि इस योजना में ग्राम प्रद्यानों, ग्राम विकास अधिकारियों व अन्य जिम्मेदार नौकरषाहों ने जमकर लुटाई की। चूंकि इस योजना को कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने शुरू किया था और अब इसका नाम महात्मा गांधी के नाम पर हो गया इसलिए बसपा सुप्रीमों का रूख इसके प्रति टेढ़ा-टेढ़ा सा है। नरेगा योजना की लोकप्रियता का फायदा पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने ही उठाया एवं बसपा नेत्री मायावती को आषातीत सफलता नहीं मिली इसलिए शायद वे नरेगा से खुन्नस रखे हुए है।
यदि इस योजना में हुए घोटालों की सही ढंग से जांच हो जाए तो अनेक आला अफसर नप जाएंगे। क्योंकि इस योजना की मॉनीटरिंग की जिम्मेदारी डीडीओ, सीडीओ, और डीएम कमिष्नर की है। बहिन जी को खुश रखने व कृपा पात्र बने रहने के चक्कर में अफसरों ने इस योजना को हासिए पर रखा। जबकि इसका सबसे ज्यादा फायदा दलितों-गरीबों को ही मिलता। लेकिन राज्य सरकार के केन्द्र से छत्तीस के आंकड़े के चलते यह महत्वाकांक्षी योजना दम तोड़ रही है।
इस योजना का हश्र इतना बुरा है कि कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में उन्होंने स्वयं कई गड़बड़ियां पकड़ी। राहुल के संसदीय क्षेत्र अमेठी में भी नरेगा की हालत पतली है। चूंकि योजना का क्रियान्वयन सूबे की सरकार को करना है, इसलिए नरेगा का असली लाभ लाभार्थियों को नहीं मिल पा रहा है।
सिर्फ सितम्बर माह में राय में नरेगा में करीब १३ सौ गड़बड़ियों की षिकायत मिली। यह संख्या बढ़ भी सकती। न केवल बसपा के ग्राम प्रधान बल्कि सपा, कांग्रेस व भाजपा मानसिकता के ग्राम प्रधानों ने इस योजना में डाका डाला। हालांकि सत्ता से जुड़े ग्राम प्रधानों को बचाने के लिए क्षेत्रीय विधायक ब्लाक प्रमुख, अफसरों ने कथित रूप से कोषिषे भी की। लेकिन कहीं-कहीं प्रबल जनविरोध एवं विपक्षी नेताओं की सक्रियता के पहले रिपोर्ट दर्ज की गई। मात्र सैतालिस एफआईआर दर्ज हो पाई। क्योंकि राजनीतिक दबाव के चलते पुलिस भी हाथ-पांव बचा कर काम कर रही है।
नेता विपक्ष षिवपाल सिंह यादव का आरोप है कि जनता के धन को भ्रष्ट अधिकारी व प्रधान खा रहे है। इसमें सत्तारूढ़ दल के कतिपय नेताओं का भी हाथ है। मात्र ४५ अधिकारियों को दोषी पाया गया और ३० कर्मचारियों सहित ४५ लोगों पर कार्यवाही की गई। यदि इस मामले की सही जांच हो जाए तो हजारों ग्राम प्रधान व ग्राम विकास अधिकारी जेल की सलाखों के पीछे होते। शायद राज्य सरकार ग्राम प्रधानों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती।
जब विपक्ष व मीडिया ने नरेगा में हो रहे घोटालों पर निषाना साधना शुरू कर दिया तो केन्द्र को चुप कराने की गरज से मुख्यमंत्री ५० फीसदी लोगों को रोजगार दिया जाना चाहिए। लेकिन सूबे की सरकार महज २० फीसद लोगों को ही रोजगार मुहैया करा पाई। पूर्वांचल व बुंदेलखण्ड में तो मात्र १७ प्रतिषत लोगों को नरेगा से जोड़ा जा सका। यानी ,एक तिहाई लोग ही इस महत्वाकांक्षी योजना का लाभ उठा पाए। योजना के तहत सिर्फ १५ दिन के भीतर ही मजदूरी का भुगतान का किया जाना चाहिए। लेकिन नौकरशाहों की वजह से तीन-तीन महीने मजदूरी के लिए इंतजार करना पड़ रहा है।
राज्य शासन की इस नाकामी पर अब केन्द्र ने मॉनीटीिंग शुरू की है। इसके चलते मुख्यमंत्री ने नरेगा से संबंधित षिकायतों पर तुरंत निस्तारण किए जाने व पीड़ितों को शीघ्र व सुलभ लाभ दिलाने का आदेष दिया। मजदूरों की षिकायत पर रसीद दी जाएगी और उस पर उसका नम्बर अंकित होगा। पीड़ित फैक्स से भी षिकायत दर्ज करा सकेगा। लेकिन षिकायत दर्ज करने के लिए सहायक विकास अधिकारी एवं ग्राम पंचायत को अधिकृत किया गया है। जबकि षिकायत करने वालों की समस्या की जड़ ही ये लोग है। ऐसे में सूबेदार की यह योजना अव्यवहारिक है। मजदूर न तो ई-मेल करना जानता है और न ही सक्षम है। ऐसे में नरेगा की असफलता राज्य सरकार के माथे पर बदनुमा दाग बन रही है। यदि शासन चाहता तो इस योजना का पूरा लाभ दलितों मजलूमों व बेकारी झेल रहे लोगों को मिल जाता। पर सियासत की चौसर में केन्द्र का पंगा अपने ही मोहरों को पीट रहा है।

केस्को ने किया कानपुर का कबाड़ा

सूबे के सबसे बडे शहर कानपुर के करीब ५० लाख लोगों को बिजली आपूर्ति देने वाले संस्थान ÷केस्को' की कार्य प्रणाली अजब-गजब है। विभाग के सीएमडी हो या उर्जा मंत्री, सबके दावों के यूज उडाते हुए भीषण गर्मी में हो रही अंधाधुंध विद्युत कटौती से पूरा नगर बिलबिला उठा है। पर इसके मुखिया को जरा भी चिंता नहीं। त्रस्त लोगों का सब्र टूट रहा है, सड कों पर उतर कर विरोध कर रही भीड हिंसक बन कानून को खतरा पैदा कर रही है। औद्योगिक एवं व्यावसायिक क्षेत्र को करोडों का नुकसान हो रहा है। आइये आपको इस नश्‍तर चुभाने वाले कटौती के करंट से रूबरू कराते हैं -

बेवफा बिजली के नखरे से कानपुर के लोग हलकान है। जून में जब गर्मी अपने पूरे शबाब पर थी तो यहां पर बिजली की कटौती भी पूरी दुश्‍मनी निभा रही थी। सूबे में सबसे ज्यादा कर अदा करने वाले इस शहर के लोगों का दुर्भाग्य है कि राजनीतिक कारणों से उन्हें बिजली कटौती का दंश सहना पड़ता है। बसपा शासन में लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के पहले तक यहां पर संतोष जनक विद्युत आपूर्ति थी। करीब १६ घण्टे बिजली मिल रही थी। लेकिन बसपा प्रत्याशी की जमानत क्या जब्त हुई कि नगरवासियों पर एक तरह से केस्को व राज्य विद्युत परिषद जुल्म ढाने लगा। ठीक अपने पूर्ववर्ती सपा सरकार की तरह। उस पर तुर्रा यह है कि उर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय जब-जब शहर आये लम्बे-चौडे वायदे कर गए, उसके बाद विद्युत आपूर्ति की और भी ज्यादा दुर्दशा हो गई। हालांकि सूबे में बिजली संकट बढा है भीषण गर्मी के कारण मांग भी बेतहाशा बढ गई है। लेकिन बीते दो दशकों से कटौती में कानपुर को ही बलि का बकरा बनाया जाता रहा है। दूसरे शहरों को किस तरह निर्बाध बिजली दी जाती है, इसका उदाहरण हैं लखनऊ, नोएडा, हाथरस, बांदा, इलाहाबाद , इन शहरों में १८ से २० घण्टे बिजली दी जा रही है।
कानपुर को बिजली देने वाले संस्थान केस्को में पहले एमडी स्तर का सीनियर आईएएस अधिकारी होता था। किन्तु बाद में यहां पर यह जिम्मेदारी टेक्नोक्रेट को दी जाने लगी। अब यह पद हटा कर यूपीपीसीएल के सीएमडी को यहां की जिम्मेदारी दी गई है। नगर में चीफ इंजीनियर रणधीर सिंह के नेतृत्व में सभी डिवीजनों के इंजीनियर व स्टेशन अधीक्षक विद्युत आपूर्ति की व्यवस्था देख रहे है। यूपी में बीते १५ सालों में मात्र ४२० मेगावाट विद्युत उत्पादन की व्यवस्था की गई जबकि इतनी अवधि में करीब ५० फीसद मांग बढ़ गई। सूबे में १० हजार मेगावाट की मांग के सापेक्ष मात्र ६५००-७००० में वाट बिजली उपलब्ध है। केन्द्र सरकार का दावा तो गले ही नहीं उतरता। एक पावर हाउस बनने में कम से कम डेढ दो साल लगता है पर केन्द्रीय विद्युत मंत्री सुशील कुमार शिंदे १०० दिनों में ५६५० मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन का दावा कर रहे हैं। वहीं रामवीर उपाध्याय तीन सालों में राज्य में सरकारी क्षेत्र में २००० व निजी क्षेत्र में २१३० मेगावाट के नए विद्युत उत्पादन केन्द्र शुरू करने का दावा कर रहे है।
कानपुर नगर को उत्तरी ग्रिड से बिजली मिलती है। यहां पर २८४ मेगावाट क्षमता का पनकी में पावर हाउस है जिसमें आजकल करीब २०० मेगावाट बिजली बन रही है। यहां सालों से २५० मेगावाट की नई यूनिट गैस आधारित लगाने पर गेल (गैस इण्डिया लि०) की सहमति न मिलने से काम शुरू नहीं हो पाया। पहले रिवर साइड पावर हाउस (अब कबाड़ हो चुका है ) से ८२ मेगावाट बिजली शहर को मिलती थी। तब बिजली की किल्लत नहीं थी। कानपुर के औद्योगिक महत्व को देखते हुए १९४७ से लेकर १९८९ तक यह कटौती मुक्त शहर था। पर सियासी प्रतिनिधित्व के कमजोरी के कारण यहां का रूतबा लखनऊ व इलाहाबाद को मिल गया। रही सही कसर केस्को व टोरंट के बीच विद्युत वितरण का नाटक पूरी कर रहा है। केस्को को प्रतिवर्ष कोई ९० करोड का नुकसान हो रहा है। इसमें से आधा लाइन लॉस के कारण बाकी केस्को कर्मियों की लापरवाही के कारण होता है।
केस्को की अंधाधुंध कटौती के कारण पूरे शहर की जलापूर्ति बाधित हो गई है। लोग एक-एक बूंद पानी का तरसते रहे। हाल यह हुआ कि पानी को लेकर खून बह गया। दो लोगों की हत्या तक बिजली सकंट के कारण हो गयी। प्यासे लोगों ने जल संस्थान को घेरा तो जीएम रतन लाल ने सारा दोष केस्को पर मढ़ दिया। दूसरी तरफ कटौती के खिलाफ उद्योगपतियों ने राजस्व न देने का एलान कर दिया। औद्योगिक फीडर से कटौती के कारण रोजाना ३० करोड से ज्यादा की उत्पादन क्षति होने से उद्योगपतियों व व्यापारियों में रोष है। कोपे इण्डस्ट्रीयल इस्टेट के चेयर मैन मलिक विजय कपूर व आईआईए के मनोज बंका व उद्यमी बलराम नरूला ने केस्को को कोसते हुए बताया कि यदि यही हालात रहे तो वे लोग यहां से उद्योग उत्तरांचल या एमपी ले जाएंगे। लाखों लोगों की रोजी रोटी के दुद्गमन बने केस्को की कार्य प्रणाली व भ्रष्ट अफसरों के चलते राज्य के सबसे बडे नगर कानपुर के ५० लाख लोगों का चैन तो छिन गया साथ ही छात्रों, व्यापारियों, उद्योगपतियों, मजदूरों, प्राइवेट सेवा के लोगों की जिन्दगी में भी अंधेरा कायम है।

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