ठहरी हुई जिन्दगी का दूसरा नाम है - डेली पैसेन्जर


गाड़ी बुला रही है ... चलना ही जिन्दगी है,
चलती ही जा रही है।


भले ही कानों से टकरा कर यह गीत दिमाग की सांकल खोलने लगे लेकिन हकीकत यही है कि गाड़ी भले ही तेजी से चलती हो किन्तु इस पर सवार डेली पैसेन्जर की जिन्दगी के पांव पर बेडिय़ां पड़ जाती हैं। वही सुबह ४-५ बजे उठना,चपटपट स्नान करना थोड़ा सा पूजा ध्यान। जल्दी-जल्दी पेट में निवाले भरना व जीभ व हसरतों को जलाती गर्म चाय की चुस्कियां। लंच बाक्स की लपक कर तेजी से स्टेशन की ओर बढ़ते कदम। ट्रेन या अन्य वाहन में बैठकर आफिस की गणित में जूझता दिमाग। माथे पर चिंताओं की उठती गिरती लहरों का मंजर। बुदबुदाते ओठों पर मसाले की तैरती पीक या फ्रेश होकर टेंशन फ्री की आड़ में अधरों पर सुलगती सिगरेट। गंतव्य स्थल की ओर फिर भागते पांव। जल्दी से हाजिरी लगाने की चाहत। फाइलों में खपाते सिर। या कारखानों में मशीनों से जूझती उंगलियां। फिर लंच और मिल बांटकर खाने का आनंद। हल्का फुल्का मजाक, तफरीह, नोंक-झोंक और फिर काम। घड़ी की सुइयों की ओर लगी टकटकी फिर घर वापसी का वही पुराना अंदाज।

सब एक घिसी पिटी कहानी या थीम का अंग। रोजाना इसी जद्दोजहद मे कम होते जिन्दगी के दिन। बीबी-बच्चों से कटी यार दोस्तों से छूटी जिन्दगी का ही दूसरा नाम है डेली पैसेन्जर।

करीब चालीस हजार लोग इस शहर से नियमित डेली पैसेन्जर है हजारों लोगों की सर्विस खत्म होने को आ गई। जिन्दगी के तमाम पड़ाव डाले। रेल के डिब्बों, बसों, ट्रकों में देख डाले। गाड़ी के पहियों के साथ ही उम्र की रफ्तार बढ़ती चली गयी ।

आचार्य नगर के सुरेश बीते २८ सालों से लखनऊ अप डाउन कर रहे हैं। चूंकि रेलवे में है अत: सहूलियतें भी मिली हैं लेकिन परिवार वाले, रिश्तेदार व इष्ट मित्रों की शिकायत रहती है कि कभी आते नहीं। सुरेश के बच्चे भी पापा की नामौजूदगी से दुखी हैं। अशोक शुक्ला बर्रा से रोजाना रायबरेली जाते हैं। ट्रेन में चलते-चलते रिटायरमेंट के करीब आ गए हैं। आईटीआई में स्पोर्ट कोटे से भर्ती अशोक अब बिटिया की शादी के लिए परेशान हैं, क्योंकि नौकरी के दौरान उनका रिश्तेदारों से संपर्क कटा रहा। श्रीमती विन्ध्यवासिनी त्रिपाठी रिटायर्ड टीचर है। पूरी जिन्दगी जिले के अकबरपुर इलाके के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाते, बस व ट्रक यात्रा में गुजार दी। यही कारण है कि अब घर में बैठकर अच्छा नहीं लगता, तो सामाजिक कार्यो में हिस्सा लेने लगी। फर्रुखाबाद का अली हसन रोजाना सुबह वाली ट्रेन से कानपुर आता है वह एक फैक्ट्री में कार्यरत है लेट होने पर आधे दिन का वेतन कट जाता है। सही समय में पहुंचना एक बड़ा टेन्शन है। बारा अकबरपुर से वकील रईस कचहरी रोडवेज बस से आते हैं। सड़क के किनारे पेड़ फैक्ट्री व खेत खलिहान आंखों व दिमाग में बस गया है। ऐसा ही फतेहपुर से कचहरी आने वाले वकील अनिरुद्घ के साथ है कभी ट्रेन तो कभी ट्रक ही उनको मंजिल तक पहुंचाता है। चूंकि इनकी वकालत यहां पर जम चुकी है और इनके जिले के लोग अपना मुकदमा उन्हे ही देते हैं। उनका मानना है कि यह भी एक सजा सरीखी है सुबह चलते हैं तो बच्चे सोते हैं और देर रात पहुंचने पर भी बेचारे इंतजार करके सो जाते हैं। पत्नी खाने का इंतजार करते-करते ऊंघ जाती है। इतवार को हफ्ते भर की खुमारी उतारते हैं। महेन्द्र व अशोक दो ऐसे डेली पैसेन्जर है जिन्होने नौकरी के सफर को ट्रेन से पूरा करते समय पूनम व सुधा को जिन्दगी का हमसफर बना डाला। महेन्द्र व पूनम सुबह एक साथ ही लखनऊ आते जाते रहे। वे कब और कैसे इतने करीब आ गए पता ही नहीं चला। हालांकि दोनों ने अन्तर्जातीय विवाह किया, लेकिन अब घर गृहस्थी मजे से चल रही है। वहीं सुधा एक बार आफिस में देर होने के कारण देर रात वाली ट्रेन से चली रास्ते में उससे कुछ लफंगों ने बदतमीजी की। फिल्मी हीरो की तरह अशोक उसे बचाने में पिटे। अचानक ही सुधा के घर वालों को अशोक जंच गया और अब यह दम्पत्ति रोज एक साथ आते जाते हैं। सेन्ट्रल व अनवरगंज के अलावा गोविन्दपुरी, पनकी व रावतपुर से हजारों लोग नौकरी के लिए लखनऊ, फतेहपुर, इलाहाबाद, फर्र्रुखाबाद, उरई, इटावा, बालामऊ, बाराबंकी, रायबरेली, हमीरपुर सहित दर्जनों छोटे स्टेशनों के लिए जाते हैं।

इनका एक तगड़ा संगठन होता है इनसे पंगा होने का मतलब आ बैल मुझे मार। करीब दो दर्जन गाडिय़ों पर इनका दबदबा रहता है। अक्सर ही डेली पैसेन्जर व आम यात्रियों के बीच विवाद एवं मारपीट की घटनाएं होती है। कई मर्तबा तो यात्रियों को चलती ट्रेन से फेंकने की नौबत आ जाती है। डेली पैसेन्जर दबाव बनाकर सीट पर जबरन बैठते हैं। आरक्षित सीट पर भी कब्जा कर लेते हैं। यही नहीं ट्रेन में जुआ खेलना, गंदगी फैलाना, अश्‍लील बातचीत करना, महिला यात्री पर फब्तियां व छेड़छाड़, बुजुर्गों से दुव्र्यवहार करना अब इस संगठन की फितरत बन चुकी है। ट्रेन का सामान तोडऩा, स्टेशन के अलावा अन्य स्थानों पर चेन पुलिंग करना, बिना टिकट यात्रा करना, एम।एस.टी. समय से न बनवाना डेली पैसेन्जर की पहचान बन चुकी है कई बार मजिस्ट्रेट चेकिंग में इन्हें पकड़ा जाता है, लेकिन दबाव बना कर सारे डेली पैसेन्जर उसे छुड़ा लेते हैं। जी.आर.पी. वाले भी इनसे दूर ही रहते हैं। दरअसल यह रेल यात्री अपनी नीरस एवं तनाव भरी ड्यूटी के चलते कुंठित हो जाते हैं। आफिस या प्रतिष्ठान में उनके बास से छोटी-मोटी तकरार का प्रभाव दिखता है। इससे उनमें हिंसक प्रवृत्तियां उत्पन्न हो जाती है। समाजशास्त्री डा. बी.एन. सिंह बताते है कि घर वालों से दूर रहने एवं काम की थकान उनकी संवेदनशीलता कम करती है। सारे डेली पैसेन्जरों की एक सी प्रवृत्ति उन्हें दुव्यर्वहार के लिए प्रेरित करती है। पर सब ऐसे नही हैं ।

जो भी हो, ये भी एक जिंदगी है और फिर ..........चलना ही जिन्दगी है, चलती ही जा रही है ....गाड़ी बुला रही है ...

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